मोबाइल पर वीडियो गेमिंग की बढ़ती लत: ये पबजी वाला है क्या

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इन दिनों भारत का युवा वर्ग पबजी खेलने में बिजी है. इस बात की गंभीरता इतनी है कि प्रधानमंत्री तक इस बारे में जानते हैं. हाल ही में एक कार्यक्रम में यह बात पता चली जब एक मां ने उनसे इस बारे में बात की.

सोचिए एक घर में दो बच्चे हैं लेकिन वो एक दूसरे के साथ ना तो लूडो खेलते हैं और ना ही कैरमबोर्ड, चेस और बेडमिंटन को छोड़ ही दीजिए. दोनों एक-एक कोना पकड़ कर बैठते हैं और पबजी खेलते हैं.

यानि वर्चुअल गेमिंग. वो एक दूसरे के साथ खेलते तो हैं लेकिन दूर से ही. ये काफी बुरा है. जब बच्चे एक दूसरे के साथ खेलते थे वही दिन अच्छे थे. खो-खो, कबड्डी, स्टापू और भी जाने क्या क्या.

अब इन सभी खेलों की जगह ऑनलाइन गेमिंग ने ले ली है. मोहल्ले के बच्चे अब पार्क में जमा नहीं होते. अब तो उनकी आखें मोबाइल पर ही लगी रहती हैं.

कभी पबजी तो कभी कोई और गेम. अब बच्चे ऐसे खेल कम खेल रहे हैं जो उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत बनाते थे. ऐसे खेल जो टीम भावना सिखाते थे और ऐसे खेल जो हिंसा नहीं बल्कि इंसानियत सिखाते थे.

अब आप कभी पार्क में जाइए. खास तौर से महानगरों के पार्कों में. वहां दिखता है कि छोटी उम्र के बच्चे ही आपस में खेल रहे हैं और पास में उनके गार्जियन, खास तौर पर मां मौजूद हैं.

थोड़ा बड़ी उम्र के बच्चे या तो कंधों पर भारी स्कूल बैग है या फिर हाथ में स्मार्टफोन है. ये बच्चे गेम खेल रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं और चाइनीज एप्लीकेशन्स पर अपलोड कर रहे हैं.

सबसे ज्यादा साइबर बुलिंग का खतरा अगर किसी को है तो इन बच्चों को. 13 से 19 साल तक के बच्चे नासमझी में कब अपनी डिटेल कहां शेयर कर दें और कौन उन्हें परेशान करने लगे भला कौन जानता है.

जो भी लोग इस खबर को पढ़ रहे हैं वो अपने आस पास देखें और बच्चों को एक दूसरे के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें. उन्हें किताबें पढ़ने को, संगीत सुनने को, पेटिंग बनाने को कहें. या फिर कुछ और ऐसा जो वो करना चाहें (बिना स्मार्टफोन के). याद रखें, बच्चों के साथ जबरदस्ती ना करें.