‘कोई नहीं रोक सकता अच्छे दिनों को, अच्छे दिन आने वाले हैं’

साल 2019 शुरू हो चुका है और जल्द ही भारतवर्ष में आम चुनावों का बिगुल बज उठेगा. साल 2014 के आम चुनावों में एक व्यक्ति “अच्छे दिनों” का सपना लेकर आया था. ना जाने इस बार कौन क्या नए-नए सपने दिखायेगा, किन्तु यह वर्ष आकलन का अवश्य है. आकलन होगा कि आखिर जो वादे किये गए थे उनमें कितने पूरे हुए, और कितने नहीं. सबसे बड़ा प्रश्न जो जनमानस के मस्तिष्कपटल पर सर्वोपरि रहेगा, शायद यही होगा “क्या वास्तव में अच्छे दिन आ गए?”

मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता और न ही उत्तर देने की काबिलियत रखता हूं किन्तु जो अंतर मैं देश में महसूस करता हूँ, व्यक्त कर रहा हूं-

ऐसा नहीं है कि गैस एवं अन्य इंधनों का भाव पहले नहीं बढ़ता था, किन्तु वर्तमान सरकार के कार्यकाल में एक समय ऐसा था जब यह दर काफी अधिक थी. पहले जब भी भाव बढ़ते थे, लोगों में रोष हुआ करता था और लोग विरोध भी किया करते थे, किन्तु इस बार देखा गया कि लोगों का बढ़ती कीमतों के प्रति भी एक सकारात्मक रुख था. कुछ लोग कह रहे थे कि भारत माता के सर से कर्जा उतर रहा है. कुछ लोग इसे सरहद पर जवानों की सुरक्षा से जोड़ कर देख रहे थे. खैर यह देख कर काफी अच्छा लगा कि लोगों के सोच बदली है. शायद यह अच्छे दिनों की आहट है.

किसानों के कर्ज तो हमेशा से सरकारें माफ़ करती आयी हैं. उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री ने भी यह कार्य किया था, किन्तु लोग पहले लोग इससे सरोकार नहीं रखा करते थे, और थोड़ा रखा भी तो इससे सरकार के अच्छे कार्यों में गिना जाता था. किन्तु अभी कुछ दिन पहले जब मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसानों की क़र्ज़ माफ़ी हुई, कोई जनता से बड़ी कड़ी प्रतिक्रिया आयी. लोगों ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था पर आघात के रूप में देखा और कड़ी निंदा की. अच्छा लगा, लोगों की स्वावलम्बी होने में रूचि बड़ी है. शायद यह अच्छे दिनों की आहट है.

पहले खाने की चीज़ों का भाव बढ़ता था, तो लोग सड़कों में आंदोलन करने उतर आते थे, किन्तु वर्तमान केंद्र सरकार के समय में जब ऐसा हुआ, तो लोगों ने गणना कर ली, कि बढ़ी हुई कीमतों से महीने का कितना खर्चा बढ़ेगा और कह दिया कि “इतने से खर्चे के लिए सरकार थोड़े ही बदल देंगे.”, कुछ ने कहा कि “वक़्त के साथ कमाई भी तो बढ़ रही है, तो खर्चा भी तो बढ़ेगा.” फर्क साफ है शिक्षा का स्तर काफी बढ़ा है. शायद यह अच्छे दिनों की आहट है.

देने को तो काफी उदाहरण हैं, किन्तु संक्षेप में यही कहना चाहता हूँ कि आज देश में एक सकारात्मक और रचनात्मक सोच की “लहर” है और जहाँ सकारात्मकता और रचनात्मकता हो, उस देश के अच्छे दिन आने से कोई नहीं रोक सकता.

(ये लेख अमेरिका में रह रहे रजत अग्रवाल ने लिखा है. इस लेख में जो भी लिखा है वह लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ashwaghosh.in उत्तरदायी नहीं है.)