‘नई बीजेपी’ के चमकदार फोटो में इन पुराने चेहरों के लिए जगह नहीं!

राममंदिर आंदोलन के बाद उत्तर-प्रदेश की धरती से बीजेपी का सत्ता के लिए उदय होना महज संयोग नहीं रहा, हकीकत है कि यूपी समेत देश के कई हिंदीभाषी राज्यों के चेहरों ने बीजेपी को राजनीति की बुलंदियों तक पहुंचाया. लेकिन ये चेहरे अब हाशिये पर पहुंच गये हैं या फिर हाशिये जैसे हालातों में हैं. खासकर यूपी के बड़े बीजेपी नेताओं के सियासी सूरज अब अवसान की ओर है. बीजेपी अब इन चेहरों के कारण नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नाम से जानी जाती है.

पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवानी बीजेपी के दिग्गज और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के परम सखा के तौर पर जाने जाते हैं. वाजपेई जी के बिस्तर पकड़ लेने के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हुए तो आडवानी कब किनारे हो गये, कोई समझ भी नहीं पाया. अगले चुनाव तक के लिए पीएम इन वेटिंग बनाये गये आडवानी सदैव के लिए पीएम इन वेटिंग हो गये.

राममंदिर आंदोलन के हीरो कहे जाने वाले कल्याण सिंह भले ही जनता और जमीन के नेता रहे हों, लेकिन बार-बार बीजेपी का दामन छोड़ने का असर उनके प्रभावी सियासी कैरियर पर पड़ा. 2014 से पहले कल्याण सिंह बीजेपी में तो लौटे, लेकिन सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गये.

लोध वोट के गढ़ माने जाने वाले सूबे की डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोकसभा सीटों पर कल्याण सिंह की तूती बोलती है, इसलिए उनके बेटे राजवीर सिंह को बीजेपी हाईकमान ने सांसद तो बनाया लेकिन पार्टी में उनका प्रभाव अपने पिता जैसा नहीं रहा. राजवीर सिंह के पुत्र संदीप सिंह 2017 में पहली बार अपने सियासी कैरियर की ओपनिंग करते हुए विधायक बने और योगी मंत्रिमंडल में उन्हें राज्यमंत्री का ओहदा भी मिला, लेकिन उनकी राजनीति में भी कल्याण सिंह जैसी हनक देखने को नहीं मिली.

याद कीजिए डॉ0 मुरलीमनोहर जोशी को. राममंदिर आंदोलन के बाद जोशी की छवि बीजेपी के रत्नों में शुमार होती थी. 1953 से आरएसएस जुड़े डॉ जोशी कई बार सांसद रहे हैं. इलाहाबाद में हैट्रिक बनाई और फिर बनारस से भी सांसद बने. लेकिन 2014 में उन्हें बनारस सीट छोड़कर कानपुर का रूख करना पड़ा. वह सांसद बन गये मगर नई टीम में उन्हें जगह नहीं मिल पाई.

कलराज मिश्र भी मुरलीमनोहर जोशी के समकालीन ही माने जाते हैं. हिंदूवादी छवि वाले इस नेता ने भी 2014 के आम चुनाव में देवरिया सीट से जीत हासिल की और केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह भी पाई, मगर 2017 में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया.

हिंदूवादी छवि के कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर-प्रदेश की मुजफ्फरनगर सीट के सांसद संजीव बालियान भी मंत्रिमंडल से बाहर निकाले गये, उनकी जगह बागपत से सांसद और नौकरशाह से नेता बने डॉ सत्यपाल सिंह को मिली.

गांधी परिवार की बहू मेनका गांधी और उनके बेटे वरूण गांधी भी लंबे समय से बीजेपी से जुड़े रहे हैं. मगर वरूण गांधी की कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि मजबूत होते ही वह अचानक हाशिये पर भेज दिए गए. हालांकि मेनका जरूर केंद्रीय मंत्री हैं. कई सालों से मां-बेटे की कांग्रेस में एंट्री की चर्चाएं भी हवा में हैं.

अयोध्या आंदोलन में तीखे भाषणों के लिए प्रख्यात उमा भारती 2014 से पहले पार्टी का बड़ा चेहरा होती थीं. लेकिन 2014 में सांसद और फिर मंत्री बनने के बाद पार्टी में उनकी तवज्जो भी कम हुई है. वह बोलती जरूर हैं, लेकिन पहले की तरह बेबाकी से नहीं. वह कई बार सांसद रहीं और मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं. बीजेपी से तल्खी होने के बाद उन्होने पार्टी छोड़कर अपनी पार्टी भी बनाई थी.

इसके अलावा विनय कटियार जैसे कट्टर हिंदूवादी नेताओं को भी पार्टी अब साथ लेना नहीं चाहती. विनय कटियार राज्यसभा से सांसद थे. हाल ही में उनका कार्यकाल खत्म होने पर इस सीट पर मेरठ की बीजेपी नेता कांताकर्दम को सांसद बनाया गया था. कांताकर्दम मेरठ मेयर सीट का चुनाव बुरी तरह हारीं थी. सूत्रों की मानें तो पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में अनुसूचित जाति के नेता को जगह देने के लिए पार्टी ने यह पहल की थी.