प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से कांग्रेस को कितना फायदा होगा?

आखिरकार प्रियंका गांधी राजनीति में आ ही गईं. उन्हें कांग्रेस का महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है. पूरी पार्टी में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है. अब देखना होगा कि मतदाता पार्टी के प्रति कितना उत्साह दिखाते हैं और कांग्रेस को कितना फायदा होता है.

यूपी की राजनीति को समझने वाले पत्रकारों के मुताबिक कांग्रेस को प्रियंका के आने से फायदा तो होगा लेकिन कितना होगा ये अभी स्पष्ट रूप से कहना कठिन होगा. क्योंकि यूथ में प्रियंका को लेकर वो उत्साह नजर नहीं आता जो किसी भी पार्टी के लिए बेहद जरूरी है लेकिन 35 से अधिक उम्र के मतदाता और ग्रामीण मतदाता प्रियंका के राजनीति में आने की खबर से उत्साहित हैं.

अगर बात पूर्वी उत्तर प्रदेश की करें तो यकीनन ये इलाका बेहद महत्वपूर्ण है. प्रियंका को यहां कांग्रेस के संगठन में जान फूंकनी होगी, कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा और चुनाव लड़ने के लिए सही उम्मीदवारों का चयन करना होगा. देखने वाली बात ये भी होगी कि वो खुद भी चुनाव लड़ेंगी या नहीं.

ये तो तय है कि इस बार प्रियंका अमेठी और रायबरेली की सीमाओं से निकल कर भी प्रचार करेंगी. अभी तक वो केवल इन्हीं दो लोकसभा क्षेत्रों में प्रचार करती थीं. इस बार हर कांग्रेस उम्मीदवार प्रियंका को प्रचार के लिए बुलाना चाहेगा. ऐसे में उनका शेड्यूल काफी बिजी होने वाला है.

अब अगर प्रियंका सही उम्मीदवार चुनें, सही मुद्दों को पकड़ें और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कायम करने में सफल रहें तो कांग्रेस को काफी फायदा हो सकता है. उन्हें बेहद निजी हमलों को लिए भी तैयार रहना होगा. बहुत संभव है कि विरोधी उनके पति राबर्ट वाड्रा को लेकर उन पर निशाना साधें. प्रियंका को अभी से इन बातों के लिए भी तैयार रहना होगा.

कांग्रेस में एक बहुत बड़ा धड़ा नॉट एक्टिव है. बहुत से नेता ऐसे हैं जो पार्टी से जुड़े तो हैं लेकिन अपने इलाके में सक्रिय नहीं हैं. दरअसल पिछले दो दशकों में कांग्रेस का संगठन यूपी में काफी कमजोर पड़ गया है. इन लोगों ने ना तो कभी धूप, बरसात, ठंड में कोई धरना-प्रदर्शन किया है और ना ही जनता के बेसिक मुद्दों को शासन-प्रशासन के सामने उठाया है. प्रियंका को ऐसे लोगों को आइडेंटिफाई करना होगा और एक्शन लेना होगा.

कांग्रेस प्रियंका गांधी को अपना तुरुप का इक्का और मास्टरस्ट्रोक तो मान रही है लेकिन याद रखना होगा कि चुनाव केवल चेहरे के सहारे नहीं लड़े जाते बल्कि संगठन के सहारे लड़े जाते हैं.