इस स्टिंग में हैरान होने जैसा कुछ नहीं, इंफ्लुएंसर मार्केटिंग है ये

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स्टिंग ऑपरेशन के लिए पहचाने जाने वाले एक संस्थान ने एक बार फिर एक स्टिंग किया है. काफी लोग इस ताजा स्टिंग को देख कर हैरान हैं जबकि इसमें कुछ हैरान करने वाला नहीं है. इसे इन्फ्लुएंसर्स मार्केटिंग कहते हैं. समाज के सम्मानित लोग जो बड़े तबके को प्रभावित करने की क्षमता रखते हों अगर वो आपके, आपकी कंपनी, आपकी पार्टी के बारे में अच्छी बातें कहेंगे तो बहुत लोग आपके बारे में अच्छा ही सोचेंगे. ये तो काफी पुराना कॉन्सेप्ट है.

जिन लोगों के स्टिंग किए गए हैं उनमें से कुछ तो पहले भी चुनावों में भिन्न-भिन्न पार्टियों के लिए वोट मांगते दिख चुके हैं. सवाल ये है कि क्या उन्होंने पहले ऐसा फ्री में किया था? कई छोटे बड़े सितारे ऐसा करते हैं. दोस्ती और पुराने परिचय की खबरें छपती हैं लेकिन बिना पैसे के भला ऐसा कैसे संभव है? हर पत्रकार जानता है कि डुप्लीकेट कलाकारों से लेकर असली कलाकारों तक से नेता अपनी हैसियत के हिसाब से प्रचार कराते हैं. ये पुराना फैशन रहा है.

अब गली-गली कलाकार को घुमाना संभव नहीं है. सेल्फी युग आ गया है. जनता से ज्यादा तो कार्यकर्ता ही सेल्फी के चक्कर में रहेंगे. इसलिए डिजिटल प्रचार. आप पैसे देंगे, वे आपके पक्ष में ट्वीट कर देंगे.

ट्विटर और इंस्टाग्राम पर अगर आपके पास लाखों फॉलोअर्स हैं तो आप भी घर बैठे कमा सकते हैं. मान लीजिए लिपस्टिक बनाने वाली कोई कंपनी उस लड़की को अपनी लिपस्टिक देती है जो ब्यूटी प्रोडक्ट के रिव्यू करती है. क्या वो लड़की मान जाएगी? एक ट्वीट का 5 से 10 हजार का रेट है. नए इंफ्लुएंसर को 2 हजार से मिलना शुरु होता है. इंस्टा पोस्ट का अलग रेट है. वीडियो का रेट अधिक होता है.

कुकर बनाने वालों से फोन बनाने वाले तक ऐसे लोगों को तलाश करते हैं और उन्हें पैसा देकर वो बाजार में अपना सामान बेचते हैं. कई देसी-विदेशी कंपनियों ने बाजार में अपनी जगह ऐसे ही बनाई है. यूट्यूब पर जो चैनल हैं, उन पर रिव्यू करने वाले किसी फोन को अच्छा और दूसरे को खराब क्यों बताते हैं. मीम्स क्यों बनते हैं. फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर आप लोग जो देखते हैं उसी को सच मानने लगते हैं.

न्यूज़ एग्रीगेटर्स भी यही करते हैं. मान लीजिए 500 वेबसाइट किसी खास फोन की, फिल्म की, किसी गैजेट की या किसी अन्य चीज के बारे में अच्छी खबरें लिखें और एग्रीगेटर्स के माध्यम से इन खबरों को अधिकतम यूजर्स के पास पहुंचा दिया जाए. इसके एवज में उस कंपनी से एग्रीगेटर पैसे ले तो इसे क्या कहेंगे. हाल फिलहाल में कुछ ऐसे स्मार्टफोन आए जिनके बारे में आप जानते तक नहीं थे लेकिन रातों-रात उनका नाम सभी जान गए. कैसे?

जब बाकी किसी चीज के प्रचार से दिक्कत नहीं है तो किसी खास पार्टी के प्रचार से भला क्या दिक्कत है. स्टिंग करने वाले से सवाल ये है कि उन्होंने अधिकतर कलाकारों से एक खास पार्टी के पक्ष में ही प्रचार करने को क्यों कहा गया. ये भी कहा जा सकता था कि हम एक नई पार्टी बना रहे हैं जिसका प्रचार आपको करना है. तब भी ये लोग मान जाते.

दूसरी बात, इससे पहले भी इस संस्थान ने मीडिया संस्थानों का स्टिंग किया था जिसमें दावा था कि एक पार्टी के पक्ष में ये लोग पैसे लेकर खबरें दिखाने को तैयार हैं. दोनों बार एक पार्टी को घेरने की कोशिश हुई. ऐसा क्यों?

तीसरी बात ये कि पेड न्यूज़ के बारे में कौन नहीं जानता. कई विदेशी न्यूज़ एग्रीगेटर्स पर कई बड़े पत्रकार लिखते हैं. इन लोगों को टॉपिक दिया जाता है जिस पर इनको लिखना होता है. ये बात कॉन्ट्रैक्ट में होती है. जो शर्तों को तोड़ते हैं उन्हें कॉन्ट्रैक्ट भी छोड़ना पड़ता है. ऐसे कई एप और मैसेंजर हैं जिनके लिए बड़ी संख्या में पत्रकार इन्फ्लुएंसर का काम कर रहे हैं. क्या ये काम वो फ्री में करते हैं?