यूपी: असदुद्दीन ओवैसी का कितना असर दिखेगा लोकसभा चुनावों में?

ये हेडलाइन पढ़ने के बाद बहुतों का जवाब होगा- बिल्कुल नहीं. लेकिन जनाब ऐसा नहीं है. इस बार ओवैसी यूपी की राजनीति में धमाका ना सही लेकिन चिंगारी तो लगाएंगे ही. यूपी के कई मुस्लिम इलाकों में ना केवल ओवैसी की चर्चा है बल्कि उनके बैनर पोस्टर भी दिखाई दे रहे हैं.

ये हाल-फिलहाल की तैयारी हो ऐसा नहीं है. एआईएमआईएम का संगठन यूपी में लंबे वक्त से सक्रिय है और मुस्लिम इलाकों में खासतौर पर पार्टी की सक्रियता है. चर्चाएं तो यहां तक हैं कि असदुद्दीन ओवैसी खुद उत्तर प्रदेश की किसी लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं.

असदुद्दीन ओवैसी के पास यूपी में ना तो कोई बड़ा संगठन है और ना ही बड़ा चेहरा. फिर भी वो यूपी में खासी मशक्कत कर रहे हैं तो इसका कारण मुसलमानों में उनकी लोकप्रियता है. कारण दो हैं- पहला कारण हैं अकबरुद्दीन ओवैसी. और दूसरा कारण है असदुद्दीन का बड़े मंचों का सही इस्तेमाल.

अकबरुद्दीन ओवैसी का नाम जैसे ही आप गूगल पर सर्च करेंगे आपको केवल जहर भरे भाषण ही मिलेंगे. यूट्यूब पर ऐसे वीडियो हजारों की तादाद में हैं जिनमें वो हिन्दुओं को ललकारते दिखते हैं, देवी-देवताओं के खिलाफ जहर उगलते दिखते हैं या फिर मोदी-योगी पर बहुत तीखी भाषा का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं.

यूपी समेत दुनियाभर में एक ऐसा तबका है जो इन भाषणों के कारण अकबरुद्दीन को अपना हीरो मानता है. इसका अंदाजा इसी बात से हो जाता है कि इन वीडियोज पर लाखों-लाख हिट भी हैं.

अब बात करें असदुद्दीन द्वारा बड़े मंचों के सही इस्तेमाल की तो ये बात बिल्कुल सही है कि उनके पास भाषा का भरपूर ज्ञान है. वो अच्छी हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू बोल लेते हैं. पाकिस्तान में वो भारत के पक्ष में बात करके सोशल मीडिया पर छा जाते हैं तो बड़े मीडिया हाउसेस के मंचों पर सुब्रमण्यम स्वामी के साथ दो-दो हाथ करते भी दिखाई देते हैं.

सोशल मीडिया ही ओवैसी बर्दर्स का हथियार है. मुसलमानों से जुड़ा कोई भी मुद्दा होता है तो मीडिया सबसे पहले लाइव पर असदुद्दीन को लेता है. वो इस मंच का बखूबी इस्तेमाल करते हैं.

आपको बता दें कि बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011 में मुस्लिमों की आबादी 17.22 करोड़ थी. देश की करीब 14 फीसदी आबादी मुस्लिम धर्म का पालन करती है. बात यूपी की करें तो यहां मुस्लिम आबादी करीब 19 फीसदी है.

ओवैसी और उनकी पार्टी इसी 19 फीसदी पर फोकस रख रही है और लगातार आगे बढ़ रही है. 2017 के विधानसभा चुनावों में 38 सीटों पर पार्टी ने उम्मीदवार उतारे थे. इस बार माना जा रहा है कि पार्टी करीब 50 सीटों पर लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार उतार सकती है.

अगर उनका एक भी प्रत्याशी यूपी से जीतता है और खाता खुलता है तो ये उनके लिए बड़ी जीत ही माना जाएगा. अब देखना ये होगा कि यूपी का मुसलमान वोटर सपा-बसपा पर भरोसा जताएगा, कांग्रेस को समर्थन करेगा या फिर ओवैसी के साथ जाएगा?