कंगना रनौत की मणिकर्णिका प्रोपेगेंडा सिनेमा की ताजा कड़ी है?

अभिनेत्री कंगना रनौत अचानक एक तबके के निशाने पर आ गई हैं. वैसे तो उन्हें इन सब बातों से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी वो चर्चा के केंद्र में तो हैं ही. अचानक वो लोग ही उनकी बुराई करने लगे हैं जो क्वीन के वक्त, ऋतिक से भिड़ने के वक्त, करण जौहर को जवाब देने के वक्त, कंगना के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे. और अचानक हुए इस बदलाव का कारण है कंगना की नई फिल्म मणिकर्णिका.

‘द प्रिंट’ के एक लेख में बताया गया है कि किस तरह जानबूझ कर फिल्म में सिंधिया को निशाने पर लिया गया है और ज्योतिरादित्य सिंधिया की छवि खराब करने का प्रयास किया गया है. वो भी तब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी दी गई है. लेख में सिंधिया घराने को वंचित वर्ग का बड़ा हितैषी भी बताया गया है. लेख में झांसी के शासक को अय्याश भी बताया गया है.

‘द वायर’ के एक लेख में फिल्म को उग्र राष्ट्रवादी बताया गया है. लेख में बताया गया है कि फिल्म को उच्च जातीय, हिंदू और भगवा रंग से रंगा गया है. मुस्लिम के द्रोही होने को तो फिल्म में इंगित किया गया है लेकिन हिन्दू के द्रोही होने पर फिल्म चुप है. फिल्म राष्ट्र की अवधारणा की इर्द गिर्द घूमती है. मातृभूमि के प्रति दीवानगी दिखाई गई है.

सोशल मीडिया पर भी इस बात की काफी चर्चा है कि फिल्म एक खास तबके के लिए बनाई गई है. साथ ही राष्ट्र भावना को प्रदर्शित करती है यानि वो चीज जिसे RSS लंबे वक्त से कहता चला आ रहा है. उरी, मणिकर्णिका, एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर जैसी फिल्मों को लगातार प्रोपेगेंडा फिल्म बताया जा रहा है.

बीबीसी हिंदी भी सवाल उठा रहा है कि रानी लक्ष्मीबाई झांसी के लिए लड़ी थीं या फिर भारत के लिए? लेख को संतुलित करने के लिए भी कुछ तथ्य डाले गए हैं लेकिन फिर भी साबित करने का प्रयास किया गया है कि उस जमाने में राष्ट्र का अर्थ उनका अपना राज्य ही था और इसी के लिए उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया था.

और कई जगहों पर भी ऐसी खबरें और लेख होंगे. इन सभी के मुताबिक उस वक्त के राजा ‘भारत’ जैसी किसी चीज को नहीं जानते थे, यह देश तो 1947 में उस वक्त आस्तित्व में आया जब अंग्रेजों ने इसे छोड़ दिया. ये लेख साबित करना चाहते हैं कि रानी झांसी भी केवल झांसी के लिए लड़ी थीं, ‘भारत’ की आजादी के लिए नहीं.

इन लेखों के मुताबिक फिल्म अति राष्ट्रवादी है जो नहीं होनी चाहिए थी. फिल्म धीरे से उच्च जाति के हिन्दुओं को सहलाती है और भगवा के प्रति स्नेह जगाती है. मुस्लिम पर निशाना करती है. सिंधिया को जबरन विलेन बनाती है जबकि वो वंचित वर्ग के हितैषी हैं.

कंगना ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर दी तो ‘द वायर’ ने उन्हें दोगला बता दिया था.

अगर कंगना बदल गईं, अगर उनकी विचारधारा बदल गई तो वो लोग भी तो बदल गए जो कल तक तारीफें कर रहे थे और आज सवाल उठा रहे हैं.