भारतीय राजनीति में क्यों खत्म होती जा रही है भाषा की गरिमा

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हाल ही में बीजेपी की एक महिला विधायक साधना सिंह ने बसपा अध्यक्ष मायावती पर जो टिप्पणी की उसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता. सवाल ये है कि भारतीय राजनीति से भाषा की गरिमा क्यों खत्म होती जा रही है?

मीडिया की सुर्खियां देखें तो ‘निशाना साधा’, ‘हमला किया’, ‘वार’, ‘पलटवार’ जैसे शब्द बहुतायत से मिलते हैं. ऐसा नहीं है कि मीडिया इसके लिए जिम्मेदार है. मीडिया तो टीआरपी की खोज में रहता है, जैसे ही कोई विवादित बयान दिखता है उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर दिखाया जाता है.

नेता भी इस बात को समझ गए हैं. बहुत सारे नेता तो ऐसा करके ही सुर्खियों में बने रहते हैं. कभी पाकिस्तान भेजने की धमकियां दी जाती हैं तो कभी सिर काटने पर ईनाम रख दिया जाता है. कभी जानबूझ कर बड़े नेता के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं.

इन टिप्पणियों को अखबारों, टीवी, डिजिटल और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुंचा दिया जाता है. एक बड़ा तबका इन टिप्पणियों को ‘मर्दानगी’ और ‘गौरव’ से जोड़ कर देखता है. इनको पसंद करता है और अपने लोगों के बीच शेयर भी करता है. इसी बात से विवादित बयान देने वालों को ताकत मिलती है.

ऐसा नहीं है कि किसी एक विशेष पार्टी के नेता ऐसी टिप्पणियां करते हैं. सभी पार्टियों में कुछ नेता ऐसे हैं जो इस प्रकार के बयान देते हैं. कई बार तो बड़े नेताओं ने भी इस प्रकार के बयान दिए हैं.

मीडिया को चाहिए कि वो इस तरह के बयानों को प्रचारित ना करे. खास तौर पर ऐसे बयानों को जो धार्मिक और जातीय उन्माद फैलाते हैं. हालांकि यदि किसी बड़ी पार्टी का कोई बड़ा पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि ऐसे बयान दे तो उसकी निंदा करते हुए कवरेज की जानी चाहिए.

समाज को समझना होगा कि ऐसे बयान केवल और केवल सुर्खियों में बने रहने और उकसाने के लिए दिए जाते हैं. अमूमन देखा गया है कि नेता बाद में यह कहकर कि बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है, अपना पल्ला झाड़ लेते हैं.