क्या भारतीय समाज से कभी खत्म हो सकेगी जाति व्यवस्था?

आज पूरे देश में केवल एक ही बात, एक ही मुद्दे पर बहस हो रही है और वो है आरक्षण. सरकार गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देना चाहती है लेकिन विपक्षी दलों ने इसे चुनावी हथकंडा बताया है. विशेषज्ञ भी ये मानते हैं कि ये बहुत सही कदम नहीं है. सवाल ये है कि क्या इस तरह की बातें समाज में जाति व्यवस्था की जड़ों को और मजबूत नहीं कर रही हैं? क्या कभी भारतीय समाज से जाति व्यवस्था खत्म हो पाएगी?

क्या कभी ऐसा होगा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अहमदाबाद से गोहाटी तक सभी लोग एक होंगे. सभी कहेंगे कि उनकी पहचान केवल भारतीय है. क्या जाति की बेडियां कभी टूटेंगी. क्या कभी ऐसा होगा कि किसी को सफाई करने के लिए गटर में उतरना ना पड़े. कभी ऐसा होगा कि मासूम बच्चे सड़कों पर कूड़ा बीनने को मजबूर ना हों.

कभी ऐसा हो पाएगा कि कमजोर, गरीब की बेटी भी रात को सुरक्षित घर आ-जा सके. क्या कभी ऐसा होगा कि फोर्थ क्लास कर्मचारी को भी वो इज्जत मिले जिसका वो हकदार है. नर्स और वार्डब्वॉय जो तीमारदारी करते हैं उन्हें सम्मान मिले. रोजाना हमारे घरों पर जो लोग कूड़ा उठाने आते हैं उन्हें सम्मान मिले. क्या कभी ऐसा होगा कि गांव की किसी पंचायत में जाति के आधार पर किसी का आपमान ना हो.

इंसान चांद, मंगल पर पहुंच गया है, अंतरिक्ष में लंबी छलांगे लगा रहा है, रोज नए अविष्कार कर रहा है और आगे बढ़ रहा है लेकिन फिर क्या वजह है कि हम आज भी जाति के जंजाल में फंसे हुए हैं. क्या इसका कारण राजनीति है? क्या इसका कारण अशिक्षा है या फिर कुछ और? क्या कभी ऐसा होगा कि ऐसा समाज बने जहां सभी लोग एक दूसरे का सम्मान करें.

बात आरक्षण की नहीं है बात हमारी मानसिकता की है. क्या कभी हम इस मानसिकता से बाहर निकल पाएंगे कि कौन ऊंचा है और कौन नीचा? जिस तरह से लगातार जाति आधारित राजनीति हो रही है उससे लगता नहीं कि फिलहाल भारतीय समाज जाति के चक्रव्यूह से निकल पाएगा.